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जानिए कैसे प्रश्न कुंडली की सहायता से जान सकते हैं अपने सवालों का जवाब।

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श्न ज्योतिष , ज्योतिष कि वह कला है जिससे आप अपने मन की कार्यसिद्धि को जान सकते है। कोई घटना घटित होगी या नहीं , यह जानने के लिए प्रश्न लग्न देखा जाता है। प्रश्न ज्योतिष मै उदित लगन के विषय में कहा जाता है कि लग्न मे उदित राशि के अंश अपना विशेष महत्व रखते है। प्रश्न ज्योतिष में प्रत्येक भाव , प्रत्येक राशि अपना विशेष अर्थ रखती है। ज्योतिष की इस विधा में लग्न में उदित लग्न , प्रश्न करने वाला स्वयं होता है। सप्तम भाव उस विषय वस्तु के विषय का बोध कराता है जिसके बारे मे प्रश्न किया जाता है। प्रश्न किस विषय से सम्बन्धित है यह जानने के लिये जो ग्रह लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता है , उस ग्रह से जुड़ा प्रश्न हो सकता है या जो ग्रह कुण्डली मै बलवान हो लग्नेश से सम्बन्ध बनाये उस ग्रह से जुडा प्रश्न हो सकता है। प्रश्न कुण्डली में प्रश्न का समय बहुत मायने रखता है , इसलिए प्रश्न का समय कैसे निर्धारित किया जाता है इसे अहम विषय माना जाता है।प्रश्न ज्योतिष शास्त्र में प्रश्न के समय व स्थान पर खगोलीय ग्रह स्थिति को आधार मानकर ज्योतिषी प्रश्नकर्ता की समस्या का समाधान ढूंढता है। अब प्रश्न उठता है कि ज...

माता भगवती दुर्गा का छठा अवतार हैं माँ कात्यायनी |

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नवरात्रि की धूम हर तरफ है | घर हो या मंदिर , हर जगह माँ दुर्गा के अलग - अलग स्वरूपों की उपासना हो रही है | भक्तों में मातारानी को प्रसन्न करने की होड़ है | ऐसे में यह आवश्यक है नवरात्रि के हर दिन की अलग - अलग महिमा के बारे में जान लिया जाए | नवरात्रि के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप माँ कात्यायनी की पूजा - अर्चना का विधान है। इसी तिथि में देवी ने जन्म लिया था और महर्षि ने इनकी पूजा की थी | माँ के इस रूप के प्रकट होने की बड़ी ही अद्भुत कथा है | कथा के अनुसार विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। ऋषि कात्यायन के घर में जन्म लेने के कारण ही इनका नाम कात्यायनी पड़ा | सांसारिक स्वरूप में माँ कात्यायनी सिंह पर आरूढ़ हैं । दिव्य रूपा कात्यायनी देवी का रूप सोने के समान चमकीला है। सुसज्जित आभा मंडल से युक्त देवी माँ का स्वरूप मन मोहक है। इनके बाँए हाथ में कमल व तलवार और दाहिने हाथ में स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा अंकि...

मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति स्कंदमाता का स्वरूप व महत्व।

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श्रुति और समृद्धि से युक्त छान्दोग्य उपनिषद के प्रवर्तक सनत्कुमार की माता भगवती का नाम स्कंदमाता है। अतः उनकी माता होने से कल्याणकारी शक्ति की अधिष्ठात्री देवी को पांचवीं दुर्गा स्कंदमाता के रूप में पूजा जाता है। नवरात्र में इनकी पूजा का विशेष विधान है। अपने सांसारिक स्वरूप में यह देवी सिंह पर विराजमान है। इस दुर्गा का स्वरूप दोनों हाथों में कमलदल पुष्प लिए हुए और एक हाथ से अपनी गोद में ब्रह्मस्वरूप सनत्कुमार को थामे हुए है। यह समस्त ज्ञान , विज्ञान , धर्म - कर्म और कृषि उद्योग सहित पंच आवरणों से समाहित विद्यावाहिनी दुर्गा भी कहलाती हैं। स्कंदमाता की पूजा भी देवी के मण्डपों में ठीक वैसे ही होती है जैसे कि अन्य देवियों की। स्कंदमाता की गोद में उन्हीं का सूक्ष्म रूप 6 सिरों वाली देवी का है। अतः इनकी पूजा में छोटी - छोटी 6 मिट्टी की मूर्तियां सजानी जरूरी है। इनके दोनों हाथों में कमल और सूक्ष्म रूपी स्कंदमाता के शरीर में धनुष बाण की आकृति है। पूजा के दौरान धनुष बाण का अर्पण करना भी शुभ रहता है। भगवान स्कंद ' कुमार कार्तिकेय ' नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग...

सत्य कि जीत में डुबो देने वाली होली पर्व का महत्वा।

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अखंड भारत वर्ष में होली का त्यौहार अपनी सांस्कृतिक और पारम्परिक मान्यताओं की वजह से प्रसिद्ध व बड़े हर्षो-उल्लास के साथ मनाया जाता है। होली त्यौहार का उल्लेख धार्मिक व पौराणिक पवित्र पुस्तकों में प्रमाणित रूप वर्णित मिलता है। चारों ओर बिखरता संगीत ढोल और नागाडो पर थिरकते हुये पैर रंगों से सराबोर और रंगो से रंग देने की लगी होड मस्ती का चारो ओर वातावरण कही घुटती भांग तो कही पकौडो की भरमार जी हाँ आज होली है। रंगो का त्यौहार होली जब आती है तो फगुवा की बयार की तरह हरेक का मन डोल जाता है। चाहे वह वृन्दावन की होली हो चाहे बरसाने की चाहे सम्पूर्ण भारत वर्ष में मनये जाने वाली होली पर उद्देष्य तो सबका एक ही है रंगो के माध्यम से हृदय को रंगना गिले सिकवे दूर हो सबमें प्रेममय वातावरण हो रंगो का त्यौहार यही तो हमे सिखाता है। अगर हम इसी प्रेम के रंग मे रंग जाये तो न कोई छोटा न कोई बड़ा न कोई खरा न कोई खोटा छुआछूत के सभी बंधनो से उठकर केवल प्रेम के रंग मे रंगकर सराबोर हो जाये। और यही प्रेम तो प्रहलाद सभी को बांट रहा था। मगर हिरण्याकश्यप स्वयं को भगवान मान बैठा था इसीलिए उसका विनाश हुआ होलिका जल गई ...