कब और कैसे करें घट स्थापना तथा पौराणिक महत्व।




'कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः
मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः।
कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा,
ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणाः
अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिताः।'
भारतीय धर्म ग्रंथो के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। धारणा है की कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित होती हैं। साथ ही ये भी मान्ययता है कि कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं। इसलिए नवरात्र के शुभ दिनों में घटस्था पना की जाती है। कलश का पात्र जलभरा होता है। जो जीवन की उपलब्धियों का उद्भव आम्र पल्लव, नागवल्ली द्वारा दिखाई पड़ता है। जटाओं से युक्त ऊँचा नारियल ही मंदराचल है तथा यजमान द्वारा कलश की ग्रीवा (कंठ) में बाँधा कच्चा सूत्र ही वासुकी है। यजमान और पुरोहित दोनों ही मंथनकर्ता हैं। पूजा के समय प्रायः उच्चारण किया जाने वाला मंत्र स्वयं स्पष्ट। सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक चैत्र नवरात्रि इस बार 18 मार्च से शुरू होकर 25 मार्च तक चलेंगी। घटस्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है। इस बार प्रतिपदा सायं 06.32 तक रहेगी। अतः सायं 06.32 से पूर्व ही कलश की स्थापना यानि घटस्थापना कर लें। इसमें भी सबसे ज्यादा शुभ समय होगा प्रातः 09.00 से 10.30 तक रहेगा। चैत्र नवरात्रि को आत्मतशुद्धि और मुक्ति का आधार माना गया है। चैत्र माह के नवरात्रि में तप-ध्यान व उपासना और पूजा- अनुष्ठान करने से घर की सारी नाकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और वातावरण में साकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ज्योतिषीय दृष्टी से चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्वा है। चैत्र
नवरात्रि में सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राशियों का चक्र पूरा कर दोबारा मेष राशि में प्रवेश करते हैं और एक नये चक्र की शुरुआत करते हैं। ऐसे में चैत्र नवरात्रि से ही हिन्दु नव वर्ष की शुरुआत होती है। धन लक्ष्मी लिहाज से देखा जाए तो धन-धन्य का प्रारम्भ चैत्र नवरात्रि के दौरान ही शुरू होता है। चैत्र नवरात्रि के वैज्ञानिक महत्व की बात करें तो यह समय मौसम परिवर्तन का होता है, इसलिए मानसिक सेहत पर इसका खासा प्रभाव देखने को मिलता है। इस समय में अक्सर लोगों के बीमार पड़ने की आशंका रहती है ऐसे में का व्रत करना शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए लाभकारी हो सकता है। अर्थात्‌ सृष्टि के नियामक विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा त्रिगुणात्मक शक्ति लिए इस ब्रह्माण्ड रूपी कलश में व्याप्त हैं। समस्त समुद्र, द्वीप, यह वसुंधरा, ब्रह्माण्ड के संविधान चारों वेद इस कलश में स्थान लिए हैं। इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि जहाँ इस घट से ब्रह्माण्ड दर्शन हो जाता है, जिससे शरीर रूपी घट से तादात्म्य बनता है, वहीं ताँबे के पात्र में जल विद्युत चुम्बकीय ऊर्जावान बनता है। ऊँचा नारियल का फल ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का ग्राहक बन जाता है। जैसे विद्युत ऊर्जा उत्पन्ना करने के लिए बैटरी या कोषा होती है, वैसे ही मंगल कलश ब्रह्माण्डीय ऊर्जा संकेंद्रित कर उसे बहुगुणित कर आसपास विकिरित करने वाली एकीकृत कोषा है, जो वातावरण को दिव्य बनाती है।


किसी परामर्श या आचार्य इंदु प्रकाश जी से मिलने हेतु संपर्क करे 9582118889
For Daily Horoscope & Updates Follow Me on Facebook

Popular posts from this blog

जानिये ज्योतिषशास्त्र के अनुसार क्यों आती है व्यवसाय में बाधायेँ ।

कारोबार में सफलता व निसंतान जोड़ो के लिए बन रहा है एक अदबुद्ध योग।

जानिए आपकी जन्मकुंडली का आपके भाग्य से क्या संबंध है।